बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संत रविदास नगर का नाम बहाल किए जाने का स्वागत करते हुए अब कांशीराम नगर समेत महापुरुषों के नाम पर बनाए गए अन्य जिलों के पुराने नाम भी वापस करने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि यदि यह फैसला बसपा संस्थापक कांशीराम के 9 अक्टूबर को होने वाले परिनिर्वाण दिवस से पहले या उसी दिन लिया जाता है, तो पार्टी सरकार की आभारी रहेगी।
प्रशासनिक सुधार के लिए बनाए गए थे नए जिले
शुक्रवार को जारी अपने बयान में मायावती ने कहा कि बसपा सरकार के कार्यकाल में प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने और आम जनता को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से कई नए जिले, तहसील, विकासखंड, पुलिस जोन और रेंज का गठन किया गया था। उन्होंने कहा कि इनमें कई जिलों का नाम दलित, पिछड़े वर्ग और अन्य समाज सुधारकों व संतों के सम्मान में रखा गया था।
मायावती के अनुसार संत रविदास नगर, छत्रपति शाहूजी महाराज नगर और भीम नगर जैसे नाम सामाजिक सम्मान और समावेशी सोच का प्रतीक थे।
सपा सरकार पर साधा निशाना
बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि बाद में समाजवादी पार्टी की सरकार ने राजनीतिक दुर्भावना और “संकीर्ण जातिवादी मानसिकता” के कारण इन जिलों के नाम बदल दिए। उन्होंने कहा कि जनता सपा के इस फैसले को कभी नहीं भूलेगी।
कांशीराम नगर का नाम भी लौटाने की मांग
मायावती ने कहा कि ब्रज क्षेत्र के विकास को ध्यान में रखते हुए बसपा सरकार ने कासगंज को जिला बनाकर उसका नाम बसपा संस्थापक कांशीराम के सम्मान में कांशीराम नगर रखा था, लेकिन बाद में सपा सरकार ने इसे फिर कासगंज कर दिया। उन्होंने इसे दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज के सम्मान के खिलाफ बताया।
9 अक्टूबर से पहले फैसला लेने की अपील
बसपा सुप्रीमो ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से अपील की कि संत रविदास नगर की तरह कांशीराम नगर और अन्य महापुरुषों के नाम पर बनाए गए जिलों के मूल नाम भी बहाल किए जाएं। उन्होंने कहा कि यदि यह निर्णय 9 अक्टूबर, कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस से पहले या उसी दिन लिया जाता है तो बसपा इसे सकारात्मक कदम मानेगी।
2027 चुनाव से पहले सियासी संदेश
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मायावती का यह बयान ऐसे समय आया है, जब बसपा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणनीति तैयार कर रही है। दलित महापुरुषों और सामाजिक सम्मान के मुद्दे को फिर प्रमुखता देकर पार्टी अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने की कोशिश में जुटी दिखाई दे रही है। वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम के मुताबिक, जिलों के पुराने नाम बहाल करने की मांग भी इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
