जनसंसार एक्सप्लेनर
भाजपा ने मध्यप्रदेश में लगभग डेढ़ दशक में व्यक्तिगत क्षत्रपों वाली राजनीति से संगठन-केंद्रित और केंद्रीय नेतृत्व नियंत्रित राजनीति की तरफ बड़ा बदलाव किया है। 2023 के बाद यह बदलाव और तेज दिखाई दिया। 2026 के दतिया उपचुनाव में भाजपा की हार और उसके बाद जिला इकाई भंग किए जाने से यह भी संकेत मिलता है कि पार्टी अब पुराने स्थानीय समीकरणों और अंदरूनी गुटबाजी को लेकर ज्यादा कठोर रुख अपना रही है।
- उमा भारती: मुख्यमंत्री से राज्य की राजनीति के बाहर

2004 में मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद उनका मध्यप्रदेश भाजपा की सत्ता-संरचना से रिश्ता कमजोर होता गया। भाजपा में वापसी के बाद उन्हें केंद्र की राजनीति में जगह मिली, लेकिन राज्य में दोबारा मुख्यमंत्री पद की दौड़ में उनका प्रभाव नहीं बन पाया।
हाशिये पर जाने का कारण:
- केंद्रीय नेतृत्व से मतभेद
- अलग पार्टी बनाने का दौर
- शिवराज सिंह चौहान का मजबूत होना
- भाजपा की राज्य राजनीति में नई सत्ता-संरचना
आज की स्थिति: सक्रिय राजनीतिक आवाज हैं, लेकिन 2003 जैसी चुनावी निर्णायक भूमिका नहीं।
- स्व. बाबूलाल गौर: मुख्यमंत्री से टिकट तक
यह भाजपा के सबसे स्पष्ट राजनीतिक उतार का उदाहरण है। कभी मुख्यमंत्री, लंबे समय तक मंत्री और भोपाल की राजनीति के मजबूत नेता रहे। 2016 में उम्र को लेकर भाजपा ने उन्हें शिवराज सरकार के मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया। उसी दौर में सरताज सिंह को भी हटाया गया इसके बाद 2018 में उनका विधानसभा टिकट भी नहीं मिला। यानी भाजपा की 75 वर्ष की उम्र वाली नई राजनीतिक नीति का सबसे बड़ा असर गौर पर पड़ा।
- सरताज सिंह: मंत्री से कांग्रेस तक
कभी शिवराज सरकार के वरिष्ठ मंत्री और भाजपा के पुराने नेताओं में शामिल रहे। 2016 में उन्हें मंत्री पद से हटाया गया। 2018 में टिकट भी नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। उम्र, भाजपा में नई पीढ़ी को आगे बढ़ाना, पुराने नेताओं की उपयोगिता कम होना के चलते वे रेस से बाहर हो गए।
- कुसुम मेहदेले: चार बार की विधायक, फिर टिकट कट गया
कुसुम मेहदेले कभी भाजपा की प्रमुख महिला नेताओं में थीं। पन्ना से कई बार विधायक रहीं और शिवराज सरकार में मंत्री भी रहीं। 2018 में उनका टिकट काट दिया गया। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से पार्टी के टिकट वितरण और उम्र के पैमाने पर सवाल उठाए। उनका विधानसभा कार्यकाल 2018 में समाप्त हुआ।
- रामकृष्ण कुसमरिया: किसान नेता से बागी तक
कुसमरिया कभी भाजपा के बड़े किसान नेताओं में थे और सांसद भी रहे। 2018 में टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर उन्होंने भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा। यहां कहानी सिर्फ टिकट कटने की नहीं थी। टिकट न मिलने के बाद उन्होंने बगावत की, लेकिन चुनावी सफलता नहीं मिली। इसके बाद उनका पुराना राजनीतिक प्रभाव लगभग समाप्त हो गया। भाजपा की नई व्यवस्था में व्यक्तिगत जनाधार से ज्यादा संगठन का निर्णय महत्वपूर्ण होने लगा।
6. जयभान सिंह पवैया: ग्वालियर का बड़ा हिंदुत्व चेहरा, सिंधिया के भाजपा में आने से समीकरण बदल गए

पवैया भाजपा के पुराने हिंदुत्व चेहरों में रहे हैं। ग्वालियर-चंबल में उनका प्रभाव था। लेकिन 2020 के बाद समीकरण पूरी तरह बदल गए। ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के भाजपा में आने के बाद ग्वालियर-चंबल की राजनीति में नए शक्ति केंद्र बने। पवैया और सिंधिया के राजनीतिक संबंध पुराने समय से विरोध वाले रहे हैं। सिंधिया खेमे के नेताओं के भाजपा में आने के बाद पवैया का राज्य सत्ता में प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा।
7. दीपक जोशी: पिता मुख्यमंत्री, बेटा कांग्रेस मे

यह भाजपा की अंदरूनी पीढ़ीगत राजनीति का बहुत दिलचस्प उदाहरण है। वह पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के बेटे और खुद पूर्व मंत्री रहे हैं। 2023 में उन्होंने भाजपा छोड़कर कांग्रेस ज्वाइन कर ली। उस समय उन्होंने पार्टी में उपेक्षा और राजनीतिक महत्व कम किए जाने की शिकायतें की थीं। मध्यप्रदेश में उस समय कई नेताओं ने सिंधिया खेमे के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी नाराजगी जताई थी। बाद में दीपक जोशी भाजपा में लौट आए।
8. नरोत्तम मिश्रा: सबसे बड़ा हालिया झटका

अगर सवाल हो कि 2023 के बाद किस दिग्गज नेता का राजनीतिक कद सबसे ज्यादा गिरा, तो नरोत्तम मिश्रा का नाम सबसे ऊपर आएगा।शिवराज सरकार के सबसे ताकतवर नेताओं में शामिल रहे गृह मंत्री जैसी जिम्मेदारी संभालने के साथ सरकार के प्रमुख रणनीतिक चेहरों में शामिल रहे। दावा तो यह किया जाता रहा है कि मिश्रा ने चार लाख कांग्रेसियों को भाजपा जॉइन कराई।
विधानसभा और संगठन दोनों में प्रभाव होने के बावजूद लेकिन 2023 में दतिया चुनाव में जनता ने नकार दिया। और 2026 में हुए उपचुनाव में उन्हें टिकट नहीं मिलने से सत्ता-कद खत्म हो गया।
हालांकि उन्हें पूरी तरह हाशिये पर कहना सही नहीं होगा। नरोत्तम के लिए दतिया अब भी सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।
9. गोपाल भार्गव: 9 बार विधायक, लेकिन मंत्री पद गया
गोपाल भार्गव नौ बार विधायक रह चुके हैं और मध्यप्रदेश भाजपा के सबसे अनुभवी नेताओं में हैं। लेकिन दिसंबर 2023 में मोहन यादव सरकार बनी तो उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। यह बहुत बड़ा राजनीतिक संकेत था। जब नौ बार का विधायक और शिवराज सरकार का इतना वरिष्ठ मंत्री नई सरकार में जगह नहीं पाता, तो क्या भाजपा पुरानी पीढ़ी को बदल रही है?
10. भूपेंद्र सिंह: शिवराज के करीबी, लेकिन नई सरकार में जगह नहीं
भूपेंद्र सिंह शिवराज सरकार में बेहद महत्वपूर्ण विभाग संभाल चुके थे। नई सरकार में उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। इसका अर्थ यह नहीं कि उनका राजनीतिक आधार खत्म हो गया, लेकिन सरकार के पावर सेंटर से उनकी दूरी जरूर बढ़ी। यह भी 2023 के बाद हुए बड़े बदलाव का हिस्सा था।
11. केपी यादव: सिंधिया को हराने वाले सांसद का टिकट गया
यह पिछले कुछ वर्षों का सबसे प्रतीकात्मक मामला है। 2019 में केपी यादव ने गुना में ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराया था। लेकिन 2020 में सिंधिया भाजपा में आ गए। 2024 में भाजपा ने गुना से सिंधिया को टिकट दिया और केपी यादव का टिकट कट गया। यानी जिस नेता ने सिंधिया को हराकर राष्ट्रीय पहचान बनाई थी, उसी सीट पर पांच साल बाद सिंधिया ही भाजपा के उम्मीदवार बन गए। यह भाजपा की राजनीति में व्यक्तिगत जीत बनाम संगठन के बड़े सत्ता-समीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है।
12. जयंत मलैया: मंत्री पद गया, टिकट पर संकट आया, फिर दमोह में वापसी
जयंत मलैया मध्यप्रदेश भाजपा के उन वरिष्ठ नेताओं में हैं, जिनका राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। वे शिवराज सरकार में वित्त मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाल चुके हैं और दमोह भाजपा की राजनीति का लंबे समय तक सबसे बड़ा चेहरा रहे।
2018 में भी वे दमोह से भाजपा के उम्मीदवार थे। इसके बाद 2020 के दमोह उपचुनाव में भाजपा की हार और पार्टी के भीतर उठे सवालों ने उनकी स्थिति को कमजोर किया। एक समय ऐसा लगा कि भाजपा में उनकी राजनीतिक पारी अब ढलान पर है।
लेकिन मलैया ने वापसी की। 2023 में भाजपा ने उन्हें फिर दमोह से उम्मीदवार बनाया और उन्होंने चुनाव जीतकर विधानसभा में वापसी की।
13. अनूप मिश्रा: अटल के भांजे से प्रदेश की राजनीति में हाशिये तक
अनूप मिश्रा की कहानी भाजपा के पुराने राजनीतिक परिवारों के कमजोर होते प्रभाव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे हैं। मुरैना से सांसद रहे और शिवराज सरकार में मंत्री भी रहे। 2018 में भाजपा ने उन्हें भितरवार से विधानसभा चुनाव लड़ाया था।
लेकिन 2018 के बाद उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार घटता गया। 2023 में भाजपा की टिकट सूची में उनका नाम नहीं आया। उस समय उनके नाम को लेकर चर्चाएं इसलिए भी थीं क्योंकि वे कभी पार्टी के प्रमुख चेहरों में गिने जाते थे। 2023 में कांग्रेस की ओर से उन्हें साधने की कोशिशों की खबरें भी सामने आईं।
माना जा रहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने से नए पावर सेंटर का बनने और लगातार चुनावी सक्रियता और संगठन में भूमिका के घटने से भी वे अप्रासंगिक हो गए।
अनूप मिश्रा की कहानी खास इसलिए है क्योंकि उनके पास “अटल परिवार” की राजनीतिक पहचान थी, लेकिन वह पहचान बाद की भाजपा में टिकट और सत्ता की गारंटी नहीं बन सकी।
उमाशंकर गुप्ता: भोपाल के मजबूत चेहरे से टिकट की राजनीति के बाहर
उमाशंकर गुप्ता कभी भोपाल भाजपा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे। वे शिवराज सरकार में मंत्री रहे और भोपाल दक्षिण-पश्चिम सीट से लगातार भाजपा के मजबूत उम्मीदवार रहे। 2013 में उन्होंने इसी सीट से 18,198 वोट के अंतर से जीत दर्ज की थी। लेकिन 2018 में कांग्रेस के पीसी शर्मा ने उन्हें 6,587 वोट से हरा दिया।
इसके बाद 2023 में भाजपा ने उन्हें दोबारा टिकट नहीं दिया। पार्टी ने भोपाल दक्षिण-पश्चिम से भगवानदास सबनानी को उम्मीदवार बनाया। 2008-2013 में उमाशंकर गुप्ता लगातार जीतने वाला मजबूत चेहरा बने। 2018 में कांग्रेस से हार गए और 2023 में टिकट से बाहर हो गए।
अब पूरी कहानी को 5 बड़े राजनीतिक बदलावों में समझिए
पहला दौर: 2011-2013 : शिवराज के सामने पुराने दिग्गजों की विदाई
- उमा भारती राज्य की सत्ता से बाहर थीं
- बाबूलाल गौर वरिष्ठ लेकिन सक्रिय सत्ता से कमजोर हो रहे थे
- कैलाश जोशी मार्गदर्शक भूमिका में जा चुके थे
- प्रभात झा का प्रदेश अध्यक्ष का कार्यकाल खत्म हो चुका था
- और शिवराज सिंह चौहान सबसे बड़ा राज्य स्तरीय पावर सेंटर बन चुके थे।
दूसरा दौर: 2014-2018 : उम्र की राजनीति और नई पीढ़ी
इस दौर में भाजपा ने पुराने नेताओं को धीरे-धीरे हटाया। सबसे बड़े उदाहरण बाबूलाल गौर, सरताज सिंह, कुसुम मेहदेले, रामकृष्ण कुसमरिया रहे। 2018 में टिकट वितरण ने इस बदलाव को और स्पष्ट कर दिया। पुराने चेहरों के स्थान पर नई पीढ़ी को आगे किया गया।
तीसरा दौर: 2018-2020 : कमलनाथ सरकार और फिर सिंधिया का धमाका
2018 में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए और उनके साथ 20 से ज्यादा विधायक भाजपा में आ गए। यहीं से मध्यप्रदेश भाजपा का पुराना समीकरण टूट गया। ग्वालियर-चंबल में पुराने भाजपा नेताओं के सामने नया पावर सेंटर खड़ा हो गया। पवैया जैसे नेताओं के लिए यह बड़ा बदलाव था।
चौथा दौर: 2020-2023 : शिवराज सरकार मजबूत, लेकिन टिकट और सत्ता में केंद्रीय नियंत्रण बढ़ा
इस समय शिवराज सरकार वापस आ गई। लेकिन भाजपा में अब केवल राज्य के पुराने नेताओं की चलने वाली स्थिति नहीं थी। केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव ज्यादा था और 2023 में इसका सबसे बड़ा परिणाम सामने आया।
पांचवां दौर: 2023-2026 : मोहन यादव युग और शिवराज कैबिनेट की पुरानी पीढ़ी की विदाई
2023 में मोहन यादव मुख्यमंत्री बने। इसके साथ ही शिवराज सरकार के कई पुराने मंत्रियों को बाहर कर दिया गया। गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह, उषा ठाकुर, ओमप्रकाश सखलेचा, बृजेंद्र प्रताप सिंह, प्रेमसिंह पटेल जैसे नेताओं का मंत्री पद जाना इसी बदलाव का हिस्सा था। यह बदलाव जनरेशन चेंज का इशारा था।
