दरअसल, लोक शिक्षण संचालनालय (DPI) भोपाल के आदेश के अनुसार ऐसे शिक्षक, जिनकी सेवानिवृत्ति में पांच साल से अधिक समय शेष है, उन्हें अनिवार्य रूप से टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी। स्कूल शिक्षा विभाग ने यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के आधार पर लिया है। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि संबंधित शिक्षकों को आदेश जारी होने की तारीख से दो वर्षों के भीतर टीईटी परीक्षा पास करना होगा, अन्यथा उन्हें सेवा से हटाया जा सकता है।
इस आदेश के तहत 9 मार्च को लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा सभी जिलों से उन प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षकों की जानकारी मांगी गई है, जिन्होंने अब तक टीईटी परीक्षा पास नहीं की है। इसके लिए 31 मार्च तक की समय-सीमा निर्धारित की गई है।
यही आदेश विवाद का मुख्य कारण बन गया है, क्योंकि इसके दायरे में वे शिक्षक भी आ रहे हैं, जिनकी नियुक्ति वर्ष 2005 और 2008 में हुई थी। उस समय लागू नियमों के अनुसार वे पात्र थे, लेकिन अब नए नियमों के लागू होने की आशंका ने शिक्षकों में असंतोष बढ़ा दिया है।
शासकीय शिक्षक संगठन के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष उपेंद्र कौशल ने बताया कि इस विषय पर 29 मार्च को सभी शिक्षक संगठनों की संयुक्त बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में संयुक्त शिक्षक मोर्चा गठित किया जाएगा और आगे की रणनीति तय की जाएगी।
उन्होंने बताया कि टीईटी के अलावा “शिक्षक एप से उपस्थिति” और “सेवा वृद्धि” जैसे मुद्दे भी बैठक के प्रमुख एजेंडे में शामिल रहेंगे। इसी बैठक में आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार की जाएगी। उपेंद्र कौशल ने यह भी कहा कि आरटीई एक्ट वर्ष 2009 में पारित हुआ और 2010 से लागू हुआ, जबकि टीईटी को 2011 से अनिवार्य किया गया। इससे पहले बड़ी संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति हो चुकी थी।
शिक्षक संगठनों का दावा है कि इस आदेश से प्रदेश के लगभग 1.5 लाख शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं, जिनमें से करीब 70 हजार शिक्षक ऐसे हैं, जिनकी नियुक्ति 2011 से पहले हुई थी। इन शिक्षकों का कहना है कि जब नियुक्ति के समय टीईटी अनिवार्य नहीं था, तो अब इसे लागू करना उनके साथ अन्याय है और इससे उनकी नौकरी पर संकट खड़ा हो सकता है।
यह मामला अब केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि “नीति बनाम न्याय” का रूप ले चुका है। जहां विभाग शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए टीईटी को आवश्यक बता रहा है, वहीं शिक्षक इसे पुराने मामलों पर नए नियम लागू करने जैसा मान रहे हैं, जिसे वे कानूनी रूप से कमजोर ठहरा रहे हैं।
शिक्षक संगठनों ने सरकार से इस मामले में रिव्यू पिटीशन दायर करने की मांग की है। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में पहले ही इस तरह की पहल की जा चुकी है। प्रदेश में इस मुद्दे को लेकर शिक्षकों द्वारा मुख्यमंत्री, कलेक्टर, सांसद और विधायकों को ज्ञापन सौंपकर अपनी बात रखी जा रही है। अब 29 मार्च की बैठक के बाद आंदोलन की दिशा और स्वरूप स्पष्ट होने की संभावना है।