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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि दूसरे राज्य से बने ओबीसी सर्टिफिकेट के आधार पर प्रदेश में आरक्षण का लाभ नहीं लिया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि शादी के बाद महिला को पति की जाति के आधार पर आरक्षण नहीं मिल सकता, क्योंकि जाति जन्म से तय होती है, न कि विवाह या निवास बदलने से।
यह मामला उत्तर प्रदेश के जालौन की रहने वाली अर्चना दांगी से जुड़ा है। उन्होंने उच्च माध्यमिक शिक्षक पात्रता परीक्षा 2018 पास की थी, लेकिन दस्तावेजों की जांच के दौरान उनका चयन रद्द कर दिया गया। कारण यह बताया गया कि उनका ओबीसी प्रमाण पत्र उत्तर प्रदेश का बना हुआ था, जिसे मध्य प्रदेश में मान्य नहीं माना गया।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दांगी जाति दोनों राज्यों में ओबीसी वर्ग में शामिल है और शादी के बाद वे मध्य प्रदेश में रहने लगी हैं, इसलिए उन्हें यहां आरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा कि जाति का आधार जन्म होता है और दूसरे राज्य का प्रमाण पत्र यहां लागू नहीं होता।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ किया कि इस मुद्दे पर पहले भी सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतें स्थिति स्पष्ट कर चुकी हैं। किसी भी व्यक्ति को दूसरे राज्य में जाकर अपनी जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता, भले ही वह जाति वहां भी सूची में शामिल हो।
अदालत ने यह भी कहा कि शादी के बाद महिला की सामाजिक पहचान बदल सकती है, लेकिन आरक्षण का हक नहीं बदलता। आरक्षण सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन पर आधारित होता है, जो जन्म से जुड़ा होता है। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और अधिकारियों के फैसले को सही ठहराया।