कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी द्वारा IIT मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि को ‘गोमूत्र विशेषज्ञ’ कहे जाने के बाद विवाद गहरा गया है। देशभर के 215 वर्तमान और पूर्व कुलपतियों तथा शिक्षाविदों ने प्रियंका गांधी को खुला पत्र लिखकर उनकी टिप्पणी पर आपत्ति जताई है। पत्र में कहा गया है कि सार्वजनिक जीवन में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन किसी शिक्षाविद् की व्यक्तिगत गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए।
‘तथ्यों और गरिमा का रखें ध्यान’
शिक्षाविदों ने अपने पत्र में लिखा कि संसद विचार-विमर्श और लोकतांत्रिक बहस का मंच है। यहां असहमति तथ्यों और तर्कों के आधार पर व्यक्त की जानी चाहिए, न कि किसी व्यक्ति का उपहास उड़ाकर।
पत्र में कहा गया कि किसी शिक्षाविद् पर सार्वजनिक टिप्पणी करते समय तथ्यों और उसकी प्रतिष्ठा का ध्यान रखना आवश्यक है। व्यंग्य या राजनीतिक बयानबाजी के नाम पर व्यक्तिगत टिप्पणियां स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं हैं।
क्या है पूरा विवाद?
लोकसभा में एंटी पेपर लीक संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान प्रियंका गांधी ने सरकार की ओर से गठित एक समिति पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उसमें पूर्व आईबी प्रमुख, एक आईटी कंपनी के मालिक और “गोमूत्र विशेषज्ञ” शामिल हैं। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा था कि ऐसे व्यक्ति शिक्षा व्यवस्था के बारे में क्या जानेंगे। विपक्ष का इशारा IIT मद्रास के निदेशक प्रो. वी. कामकोटि की ओर माना गया।

पत्र में क्या कहा गया
शिक्षाविदों ने अपने पत्र में दो प्रमुख बातें रखीं—
- संसद में विचारों और नीतियों पर बहस होनी चाहिए, व्यक्तियों का उपहास नहीं।
- प्रो. वी. कामकोटि पर की गई टिप्पणी अनुचित थी और इससे शिक्षण समुदाय की गरिमा प्रभावित होती है।
2025 में चर्चा में आए थे प्रो. कामकोटि
प्रो. वी. कामकोटि वर्ष 2025 में उस समय सुर्खियों में आए थे, जब उनका एक वीडियो वायरल हुआ था। इसमें उन्होंने दावा किया था कि गोमूत्र में एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण पाए जाते हैं और यह इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) जैसी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं में उपयोगी हो सकता है।
वैज्ञानिक अध्ययन का दिया था हवाला
अपने दावे के समर्थन में प्रो. कामकोटि ने जून 2021 में विज्ञान पत्रिका Nature में प्रकाशित एक शोध का उल्लेख किया था। यह अध्ययन नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (NDRI) के वैज्ञानिकों ने किया था, जिसमें गोमूत्र में पाए जाने वाले विभिन्न पेप्टाइड्स और उनकी जैव सक्रियता (Bioactivity) पर शोध प्रकाशित किया गया था। हालांकि, इस अध्ययन को किसी विशेष बीमारी के इलाज का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना गया था।
