![]()
सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के चार साल के बाघ की हत्या में नए खुलासे सामने आए हैं। शिकारियों ने मृत बैल के दोनों कान काट दिए ताकि टैग से मालिक की पहचान न हो सके। इसके साथ ही बाघ के गले में लगी छह लाख रुपए से अधिक कीमत की कॉलर आईडी भी जला दी गई। इसके बाद बाघ को 200 मीटर दूर गड्ढे में दफन किया गया।
कॉलर आईडी की आखिरी लोकेशन के आधार पर टीम छिंदवाड़ा के सांगाखेड़ा रेंज के छातीआम गांव पहुंची, जहां खेत मालिक उदेसिंग के खेत में मृत बैल मिला। इस घटना से एसटीआर की मॉनिटरिंग टीम की लापरवाही और सुरक्षा में चूक सामने आई। कॉलर आईडी की आखिरी लोकेशन 3 मार्च को मिली थी, लेकिन टीम वहां पहुंचने में 24 दिन लग गए। बाघ की रियल-टाइम मॉनिटरिंग नहीं की गई। अफसरों का कहना है कि निगरानी सामान्य तरीके से हो रही थी, लेकिन सवाल यह उठता है कि सामान्य निगरानी में 24 दिन तक शिकार की जानकारी क्यों नहीं मिली।
एसटीआर फील्ड डायरेक्टर राखी नंदा के अनुसार, बाघ को डेढ़ साल पहले बांधवगढ़ से लाया गया था और तब कॉलर आईडी लगाई गई थी। कुछ महीनों से उसकी सामान्य निगरानी हो रही थी। कॉलर हटाने के लिए विभाग ने पत्र लिखा था और WWF से अनुमति मिलने के बाद लोकेशन तलाशना शुरू किया गया, लेकिन तब तक बाघ का शिकार हो चुका था।
26 मार्च को टीम छातीआम गांव पहुंची, जहां मृत बैल मिला। संदेह के आधार पर डॉग स्क्वॉड ‘अपोलो’ और ‘स्कूबी’ को बुलाया गया। 27 मार्च को सर्चिंग के दौरान डॉग स्क्वॉड खेत मालिक तक पहुंची। पूछताछ में उदेसिंग ने शिकार की घटना स्वीकार की। इसके बाद 200 मीटर दूर जंगल में बाघ का 24 दिन पुराना शव बरामद हुआ। पांचों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
वन्यजीव विशेषज्ञ अजय दुबे ने कहा कि यदि बाघ के गले में कॉलर लगा था तो उसकी नियमित और रियल-टाइम मॉनिटरिंग होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बाघ की मौत के 24 दिन बाद खोज शुरू हुई, जो गंभीर लापरवाही को दिखाती है। प्रबंधन के पशु चिकित्सक की जिम्मेदारी में चूक हुई, जो संरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है।
फॉरेस्ट टीम जब तामिया के जंगल में पहुंची तो अफीम की खेती भी मिली। अफीम के 6148 पौधे, जिनका वजन 194.5 किलो है, जब्त किए गए। पुलिस ने धारा 8, 18(C), 25 NDPS एक्ट के तहत मामला दर्ज किया।
