दिग्विजय सिंह ने कहा कि यदि शिक्षक व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल करेंगे, तो उन्हें सीनियर वकीलों की सेवाएं लेनी पड़ेंगी, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ेगा। ऐसे में राज्य सरकार को आगे आकर शिक्षकों के हित में पहल करनी चाहिए। पत्र में उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सिविल अपील क्रमांक 1385-1386 (2025) महाराष्ट्र से संबंधित मामला था, जिसमें मध्यप्रदेश पक्षकार नहीं था। इसलिए राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
उन्होंने लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के लिए राहत की मांग करते हुए कहा कि प्रदेश में पहले से ही व्यवसायिक परीक्षा मंडल के माध्यम से मेरिट के आधार पर शिक्षक भर्ती होती रही है। वर्तमान में कार्यरत शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से मुक्त किया जाना चाहिए, खासकर उन शिक्षकों को जिन्होंने 25 वर्ष से सेवा दी है। उन्होंने यह भी कहा कि आरटीई कानून को प्रदेश में लागू होने की तिथि से ही प्रभावी माना जाना चाहिए और उसी आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।
दिग्विजय सिंह ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक मध्यप्रदेश में कार्यरत शिक्षकों से टीईटी परीक्षा न ली जाए। इसके अलावा, प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से टीईटी की बाध्यता से राहत दी जाए, ताकि उनकी नौकरी पर कोई संकट न आए।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि 40 से 50 वर्ष से अधिक उम्र के शिक्षकों से दोबारा परीक्षा लेना क्या उचित है। ऐसा करने से शिक्षकों पर मानसिक और आर्थिक दबाव बढ़ेगा। शिक्षकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने उनसे मुलाकात कर अपनी मांगें रखीं, जिसके आधार पर उन्होंने सरकार से हस्तक्षेप कर शिक्षकों के हित में कदम उठाने की अपील की है।