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गुना के कैंट थाना क्षेत्र में एक युवक को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में कोर्ट ने दो आरोपियों को सात-सात साल की सजा सुनाई है। इस मामले में कुल सात आरोपियों में से पांच को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया। सजा पाने वालों में एक आरोपी बार एसोसिएशन का उपाध्यक्ष और पेशे से वकील है।
यह मामला वर्ष 2020 का है। 8 अक्टूबर को कार्तिक, पिता उदय जोशी, ने पुलिस को घटना की जानकारी दी थी। उसने बताया कि उसके पिता के मित्र अर्जुन किरार रात करीब 9 बजे उनके घर आए थे। रात 10:30 बजे उसके पिता ने बताया कि अर्जुन दुकान में सोएंगे और सुबह भोपाल जाने वाले हैं, इसलिए उन्हें सुबह 5 बजे जगा देना।
कार्तिक के अनुसार, उसके पिता रात 12:30 बजे अपने मित्र सौरभ सोनी के साथ कार से इंदौर रवाना हो गए थे। सुबह लगभग 5:20 बजे वह अर्जुन को जगाने दुकान पहुंचा और गेट खटखटाया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद वह घूमने चला गया।
करीब 8:30 बजे लौटने पर भी दुकान का गेट बंद मिला। कई बार आवाज देने के बाद भी जब कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो उसने अपने दादा सुरेश जोशी और मित्र जयसिंह नगर को बुलाया। इसके बाद दुकान का गेट तोड़कर अंदर देखा गया, जहां अर्जुन किरार रस्सी के सहारे पंखे से लटके मिले। फौरन रस्सी काटकर उन्हें नीचे उतारा गया, लेकिन तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी। इसके बाद परिजनों को सूचना दी गई और पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू की।
जांच के दौरान मृतक के परिजनों के बयान दर्ज किए गए। अर्जुन ने एक सुसाइड नोट भी छोड़ा था, जिसमें कुछ लोगों पर पैसों के लेनदेन को लेकर दबाव बनाने और प्रताड़ित करने के आरोप लगाए गए थे। उसने लिखा था कि इसी मानसिक दबाव के कारण उसने यह कदम उठाया।जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने सात आरोपियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की धाराओं में प्रकरण दर्ज कर कोर्ट में चालान पेश किया।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने पांच आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया, जबकि दो आरोपियों—विक्रम बोहरे (51), निवासी माथुर कॉलोनी, और अरविंद जैन, निवासी नई सड़क—को दोषी करार देते हुए सात-सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। साथ ही दोनों पर 10-10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
विक्रम बोहरे वर्तमान में बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष हैं।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपियों की लगातार प्रताड़ना से परेशान होकर युवक ने आत्महत्या की। घटना के समय उसकी पत्नी गर्भवती थी। ऐसे मामलों में दंड ऐसा होना चाहिए, जिससे समाज में इस प्रकार के अपराध के प्रति भय उत्पन्न हो।इस मामले में फैसला चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश राघवेंद्र भारद्वाज ने सुनाया। वहीं, शासन की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक आशाकिरण कौर ने पैरवी की।
